Saturday, 2 April 2016

अगले दस सालों में भी कोंकण रेलवे कश्मीर की रेल योजनाएं पूरी नहीं कर पाएगी-श्रीधरन
सामरिक महत्व की राष्ट्रीय परियोजनाओं को देखने जाने में किसी रेलमंत्री की रुचि नहीं रही
आलोचना से बचने के लिए कोंकण रेलवे ने प्रायोजित मीडिया टूर पर खर्च किए लाखों रुपए
- यशवंत के. जोगदेव

कोंकण रेलवे की ठेकेदारी में जम्मू-कश्मीर में चल रही विभिन्न रेल परियोजनाओं की वर्तमान दशा और दिशा को ध्यान में रखते हुए जितनी जल्दी हो सके उतनी जल्दी यह सभी परियोजनाएं सेना के निर्माण कोर अथवा तत्सम निर्माण संगठनों या फिर भारतीय रेल के ही निर्माण संगठन को सौंप देना अब देश की सुरक्षा की दृष्टि से अत्यावश्यक हो गया है. कोंकण रेलवे के संस्थापक, विख्यात अभियंता और पूरे देश में मेट्रोमैन की ख्यातिप्राप्त ई. श्रीधरन की भी यही राय है. उल्लेखनीय है कि श्रीधरन ने करीब दस साल पहले ही यह भविष्यवाणी की थी कि यदि कोंकण रेलवे ने जम्मू-कश्मीर की उक्त रेल परियोजनाओं को समय पर पूरा कर लिया, तो अभियांत्रिकी के क्षेत्र में यह एक बहुत बड़ा चमत्कार माना जाएगा. परंतु कोंकण रेलवे पिछले दस सालों में यह परियोजनाएं पूरी नहीं कर पाई है, इसलिए श्रीधरन के अनुसार कोई चमत्कार नहीं हुआ है. उनका तो यह भी मानना है कि कोंकण रेलवे अगले और दस सालों में यह परियोजनाएं पूरी कर ले, तब भी यह बहुत बड़े आश्चर्य की बात होगी.
‘आगे बढ़ें हम सीना ताने, नहीं झुकें हम, नहीं डरें हम, विपदाओं के तूफानों में’, राष्ट्रभक्ति की प्रेरणा देने वाला यह गीत राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ की शाखाओं में गाया जाता है. देश के वर्तमान रक्षामंत्री मनोहर पर्रीकर और प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी तथा उनके लगभग सभी मंत्रीगणों पर भी संघ का यही संस्कार हुआ है. किंतु देश की उत्तरी सीमा जम्मू-कश्मीर के आसपास तक पाकिस्तान और चीन अब भारत के सीने पर पैर रखकर खड़े होने को तैयार हैं. ऐसी स्थिति में देश की रक्षा के लिए नितांत आवश्यक रेल परियोजनाएं युद्धस्तर पर पूरी होनी चाहिए. ऐसी विकट परिस्थिति में रेल मंत्रालय द्वारा जम्मू-कश्मीर को बाकी देश से जोड़ने वाली रेल परियोजनाएं कोंकण रेलवे को सौंपी गई थीं, जिन पर तेजी से अमल किया जाना था, मगर राष्ट्रीय महत्व की इन रेल परियोजनाओं की प्रगति अत्यंत धीमी और शर्मनाक है.
अतः अब एक स्वतंत्र प्रभावी एवं युद्धस्तर पर कार्य करने वाली यंत्रणा को यह परियोजनाएं सौंपी जानी जरूरी हैं. देश की सुरक्षा और संरक्षा की दृष्टि से सीमावर्ती क्षेत्र में इन महत्वपूर्ण रेल परियोजनाओं का उत्तरदायित्व संभाल पाना मुंबई में बैठकर अब कोंकण रेलवे के आरामतलब अधिकारियों के लिए संभव नहीं है. शुरू में कोंकण रेलवे की तरफ से देश के विख्यात अभियंता जम्मू-कश्मीर की इन रेल परियोजनाओं में समर्पण भाव से कार्यरत थे, मगर अब ऐसी स्थिति नहीं रह गई है. इसलिए चीन और पाकिस्तान की चुनौती का उग्र स्वरूप ध्यान में रखते हुए अब इन परियोजनाओं के निर्माण का उत्तरदायित्व भारतीय सेना की निर्माण इकाई अथवा किसी अन्य सक्षम संगठन को सौंपा जाना देश की सुरक्षा की दृष्टि से अत्यावश्यक हो गया है.
एक तरफ चीन ने भारत की उत्तरी सीमा पर बीजिंग से लद्दाख और तिब्बत की सीमा के निकट तक एक हजार किमी. से भी ज्यादा लंबी रेल लाइन का निर्माण कार्य पूरा कर लिया है. इतना ही नहीं, पाकिस्तान से सहयोग करके हिंद महासागर में भारतीय नौसेना की शक्ति पर आह्वान स्वरूप बलूचिस्तान में ग्वादर बंदरगाह का निर्माण कार्य चीन द्वारा किया जा रहा है. निकट भविष्य में भारत के सीमावर्ती हिमालय क्षेत्र से होकर चीन की यह रेलवे लाइन ग्वादर बंदरगाह तक जोड़ी जाने वाली है. यह भारत के लिए एक बहुत बड़ी रक्षा चुनौती साबित होने जा रही है.
पाकिस्तान और चीन के इस सहयोग से भारत की रक्षा क्षमता को दी जा रही चुनौती का सामना करने के लिए रेल मंत्रालय की ओर से 2003 में पूर्व रेलमंत्री नीतीश कुमार के कार्यकाल में प्रख्यात तीर्थस्थल माता वैष्णोदेवी त्रिकुटा पहाड़ी के नीचे ही जम्मू-कश्मीर को जोड़ने वाली इस राष्ट्रीय रेल परियोजना का शुभारंभ कटरा के पास एक सुरंग की खुदाई से शुरू हुआ था. जम्मू-कश्मीर में चलने वाले आतंकवाद के कारण कश्मीर की सीमाओं में बारामूला, उरी, पुंछ और पाकिस्तान द्वारा जबरन कब्जाए गए कथित आजाद कश्मीर के मुजफ्फराबाद इत्यादि सभी सीमावर्ती क्षेत्रों तक महत्वपूर्ण मिलिट्री साजो-सामान, टैंक, आर्टीलरी तथा मिसाइल आदि युद्ध सामग्री के साथ सेना की आवाजाही के लिए यह रेल परियोजनाएं अत्यंत महत्वपूर्ण हैं. परंतु इन रेल परियोजनाओं की जो हालत है, उसे देखकर किसी भी देशाभिमानी नागरिक को रेलवे के इस अत्यंत लापरवाहीपूर्ण कामकाज के प्रति क्षोभ उत्पन्न होना स्वाभाविक है.
पूर्व प्रधानमंत्री अटलबिहारी वाजपेयी ने जम्मू-कश्मीर के दुर्गम क्षेत्र को रेलवे के जरिए शेष देश से जोड़ने के लिए एक खास अनुदान के रूप में बिना किसी ऑडिट की एक हजार करोड़ रु. की धनराशि इन रेल परियोजनाओं को देने की घोषणा की थी. कश्मीर में जम्मू से श्रीनगर जाने वाले नेशनल हाईवे नं. 1-ए, जो कि एक अत्यंत दुर्गम क्षेत्र में जाता है, जम्मू से उधमपुर, और फिर वहां से पीर पंजाल रेंज के 6 हजार फीट ऊंचे पहाड़ पार करके पाटनी टॉप से यह हाईवे फिर रामबन तक चेनाब नदी के पुल के पास घाटी में उतरता है. वहां से हिमाच्छादित बनिहाल टनल को पार करके फिर यह हाईवे काजीगुंड से कश्मीर में प्रवेश करता है. वहां से अनंतनाग, श्रीनगर, बारामूला, उरी, पुंछ, मुजफ्फराबाद तक, पाकिस्तान के निकट युद्धक्षेत्र को जोड़ने के लिए, यह नेशनल हाईवे एकमात्र जमीनी यातायात का साधन था. किंतु हर साल लैंड स्लाइड, भारी बर्फबारी, भीषण दुर्घटनाएं और दुर्गम उतार-चढ़ाव के कारण जम्मू से बारामूला (338 किमी.) तक लंबे इस हाइवे पर कई बाधाएं और समस्याएं लगातार आती ही थीं. इसलिए कश्मीर के संरक्षण और विकास हेतु जम्मू से बारामूला तक जाने वाले इस 338 किमी. लंबे रेलवे मार्ग का प्रारूप बनाया गया था. उस समय रेल परियोजनाओं के कुशल निर्माण के क्षेत्र में कोंकण रेलवे का नाम अग्रसर होने के कारण यह काम कोंकण रेलवे को सौंपा गया था.
जम्मू-कश्मीर का यह क्षेत्र उत्तर रेलवे के क्षेत्र में आता है. यह काम कोंकण रेलवे को देने के कारण ‘मेरे अंगने में तुम्हारा क्या काम है’ की तर्ज पर, जैसी भावना भी शुरू से उत्तर रेलवे के अधिकारियों के मन में जम गई थी. इसी कारण कोंकण रेलवे की राह में बार-बार रोड़ा डालकर गतिरोध पैदा करने का प्रयास उत्तर रेलवे के उच्च अधिकारियों ने भी किया. हिमालयीन जियोलॉजी, लैंड स्लाइड, गहरी नदियां और 25 हजार फुट ऊपर से आने वाले चेनाब नदी के जोरदार प्रवाह को रोकने के लिए कटरा से रियासी-संगलदान होकर बनिहाल सुरंग तक यह रेलवे लाइन 2 हजार फीट से 6 हजार फीट की ऊंचाई तक जाती है. तत्पश्चात काजीगुंड तक पहुंचने के बाद फिर यह समतल रास्ते से बारामूला पहुंचती है.
इस संपूर्ण क्षेत्र की दुर्गमता और समस्याओं को ध्यान में रखकर इसके तीन विभाग किए गए. जम्मू से उधमपूर और कटरा तक निर्माण का काम उत्तर रेलवे को सौंपा गया. बारामूला से काजीगुंड का काम इरकॉन को दिया गया. अब बारामूला से बनिहाल तक और जम्मू से कटरा तक रेलवे मार्ग चालू हो गया है, लेकिन कटरा से दुर्गम पहाड़ी क्षेत्र में जाने वाले मार्ग पर कई सुरंग और दुनिया के सबसे ऊंचे दो पुल हैं. कोंकण रेलवे को सौंपे गए इस तीसरे भाग में चेनाब नदी के ऊपर, नदी के तल से 359 मी. ऊंचा, एक विशेष पुल निर्माणाधीन है. ज्ञातव्य है कि कुतुबमीनार की ऊंचाई 72 मीटर एवं एफिल टॉवर की ऊंचाई 324 मीटर है, जबकि चेनाब पुल की आर्च स्पैन 467 मीटर की है. इस पुल का निर्माण हो जाने पर नदी के तल से विश्व के सबसे ऊंचे रेल पुलों में इसी पुल का नाम शुमार होगा.
परंतु इस अत्यंत महत्वपूर्ण रेल परियोजना की स्थिति क्या है? कोंकण रेलवे मुंबई से 14 से 18 मार्च तक एक प्रेस टूर लेकर इस क्षेत्र का अवलोकन कराने या मीडिया को ‘ओब्लाइज’ करने गई थी. चेनाब ब्रिज और संगलदान के पास धामकुंड के परिसर में चेनाब नदी पर रास्ते के ऊपर एक पुल बन रहा है. इस पुल का अब तक सिर्फ अप्रोच का काम पूरा हुआ है. चेनाब के ऊपर एक धनुषाकार पुल के निर्माण में 26 हजार मैट्रिक टन स्टील का प्रयोग होगा. यह सारे भव्य-दिव्य दृश्य मुंबई की मीडिया को दिखाकर कोंकण रेलवे अपनी पीठ अपने-आप ही थपथपा रही है. जबकि जमीनी स्तर पर वह अपना काम पिछले दस सालों में भी पूरा नहीं कर पाई है.
वास्तव में इस पुल के निर्माण में करीब 500 करोड़ रु. की लागत आने का अनुमान था. यह काम मुंबई की प्रसिद्ध एफकॉन कंपनी को दिया गया था. यह काम 2008 तक पूरा होने की उम्मीद थी, लेकिन 2008 में ही रेलवे बोर्ड की तरफ से यह काम रोक दिया गया. इसके फिर से निर्माण की अनुमति 2009 में दी गई. जबकि अब तक इस स्टील ब्रिज की एक धनुषाकृति कमान तक भी बन नहीं पाई. इसके लिए अभी-भी कम से कम और पांच साल लगेंगे.
इसके साथ ही कटरा के पास प्रारंभ में ही टनल क्रमांक 1 के निर्माण का शुरू किया गया काम अभी-भी बाकी है. दूसरी टनल का निर्माण करने वाला कांट्रैक्टर (संचेती) यह काम छोड़कर चला गया है, जिससे इस टनल का काम अधूरा पड़ा है. इसके साथ टनल क्रमांक 5, जो चेनाब ब्रिज को जोड़ती है, का भी बहुत सा काम अभी बाकी है. स्पष्ट है कि यह देश की रक्षा दृष्टि से अत्यंत महत्वपूर्ण 338 किमी. की रेलवे लाइन बनने के लिए पिछले 15 साल से भी ज्यादा का समय व्यर्थ चला गया है. वर्तमान से लेकर अब तक हुआ कोई भी रेलमंत्री चेनाब पुल अथवा राष्ट्रीय महत्व की इन रेल परियोजनाओं का निरीक्षण करने के लिए आज तक वहां नहीं पहुंचा है.
वर्ष 2003 से 2008 तक जब इस क्षेत्र में रेल निर्माण कार्य बहुत तेजी से चल रहा था, तब उस दौरान तत्कालीन रेलमंत्री लालू प्रसाद यादव तीन दिन श्रीनगर में रुके थे. हालांकि श्रीनगर से हेलीकॉप्टर द्वारा चेनाब पुल तक पहुंचने के लिए 15 मिनट का समय पर्याप्त था. तथापि तीन दिन तक श्रीनगर की वादियों का नजारा और मौज-मस्ती करने में लगे रहे लालू प्रसाद यादव भी इस परियोजना का निरीक्षण या अवलोकन करने नहीं पहुंचे.
यदि देश की रक्षा के लिए बनाई जाने वाली राष्ट्रीय महत्व की परियोजनाओं को देखने जाने में किसी रेलमंत्री की ही कोई रुचि नहीं है, तो ऐसे में खुद रेलवे की निर्माण परियोजनाओं, उनकी प्रगति एवं अवस्था का अंदाजा बखूबी लगाया जा सकता है. यदि सरकार या मंत्री द्वारा सामरिक दृष्टि से महत्वपूर्ण राष्ट्रीय परियोजनाओं को नजरअंदाज करने का ऐसा ही अक्षम्य कारोबार चलता रहा, तो चीन और पाकिस्तान के आपसी सहयोग से आने वाले समय में सीमा पर जो भीषण स्थिति पैदा होगी, उसका उत्तरदायित्व रेलमंत्री से लेकर रेलवे बोर्ड के सभी अधिकारियों को स्वीकार करना होगा.



5 अप्रैल को लॉन्च होगा पहला गतिमान एक्सप्रेस
फ्लाइट्स की तरह भारतीय रेलवे में भी यात्रियों को होस्टेस की मदद मिलने का रास्ता साफ हो गया है. जल्द ही कुछ ट्रेनों में होस्टेस गुलाब का फूल देकर यात्रियों का स्वागत करेंगी. यात्री रेल बजट में किए गए मंत्री सुरेश प्रभु के ऐलान को अब साकार होते देख पाएंगे. उन्होंने फ्लाइट्स की तरह ही तेज गति ट्रेन का ऐलान किया था. इसके साथ ही होस्टेस की तैनाती की बात भी कही थी.
5 अप्रैल को लॉन्च होगा पहला गतिमान एक्सप्रेस
 रेलवे ने दिल्ली-आगरा गतिमान एक्सप्रेस सेवा में ट्रेन होस्टेस तैनात करने का फैसला किया था. इसे महिलाओं के लिए रोजगार बढ़ाने से जोड़कर भी देखा जा रहा है. यह ट्रेन 160 किमी प्रति घंटे की रफ्तार से चलने वाली पहली ट्रेन होगी. रेल मंत्री प्रभु 5 अप्रैल को गतिमान एक्सप्रेस को हरी झंडी दिखाकर लॉन्च करने वाले हैं.

नौ रूटों में होस्टेस की होगी तैनाती
रेल मंत्रालय के एक वरिष्ठ अधिकारी के अनुसार हम विमान की तरह गतिमान एक्सप्रेस में अच्छी सेवा देने की कोशिश कर रहे हैं. इस एक्सप्रेस ट्रेन को बाद में सभी नौ रूटों चलाया जाएगा और सबमें पर यह विशेषता उपलब्ध रहेगी. इन रूटों में कानपुर-दिल्ली, चंडीगढ़-दिल्ली, हैदराबाद-चेन्नई, नागपुर-बिलासपुर, गोवा-मुंबई और नागपुर-सिकंदराबाद शामिल है. उन्होंने कहा कि देश के पहले सेमी-हाई स्पीड ट्रेन की इस खासियत को राजधानी एक्सप्रेस और शताब्दी एक्सप्रेस में भी बढ़ाने वाले हैं.
गतिमान एक्सप्रेस ट्रेन की और विशेषताएं
गतिमान एक्सप्रेस दिल्ली से आगरा 200 किमी की दूरी 105 मिनट में पहुंचाएगी. इसमें 5400 एचपी इेलेक्ट्रिक लोकोमोटिव के साथ 12 कोच होंगे. मौजूदा सबसे तेज ट्रेन शताब्दी एक्सप्रेस आगरा से दिल्ली की तय करने में 120 मिनट का समय लेती है. गतिमान एक्सप्रेस का किराया शताब्दी एक्सप्रेस से 25 फीसदी अधिक होगा. इसमें हाई-पावर इमरजेंसी ब्रेक, ऑटोमैटिक फायर अलार्म, जीपीएस आधारित पैसेंजर इंफॉर्मेशन सिस्टम और कोच में स्लाइडिंग डोर जैसी सुविधाएं होंगी. इंफोटेनमेंट के लिए ट्रेन में लाइव टीवी सर्विस उपलब्ध होगा.
उन्नत होंगी कैंटीन की सुविधाएं
इस ट्रेन में कैटरिंग सर्विस भी एयरलाइंस के स्तर की होंगी. इसके कैंटीन की ओर से भारतीय और महाद्वीपीय व्यंजन मिलेंगे. इसके मेन्यू में गेहूं का उपमा, मिनी डोसा, कांजीवरम इडली, ताजे फल, स्विस रोल के साथ आलू कुलचा, भुने मेवे और चिकन रोल मिलेगा. चिकेन सॉस के साथ स्पेनिश एग ऑमलेट और अखरोट स्लाइस केक बोन चाइना क्रॉकरी में सर्व किए जाएंगे.


Updated: 2016-04-02 02:10:39IST

यात्रियों को नहीं थी जानकारी, अचानक मिली सुविधा तो चहके, स्टेशन पर पहुंचने वाला कोई भी व्यक्ति ले सकता है इस सुविधा का लाभ
भोपाल. भोपाल रेलवे स्टेशन के विभिन्न प्लेटफॉर्म पर शुक्रवार को अलग नजारा था। टे्रन का इंतजार कर रहे कुछ यात्री जहां हर बार की तरह स्टेशन पर बैठकर रेलवे को कोस रहे थे वहीं कुछ यात्री मोबाइल पर फ्री इंटरनेट का मजा ले रहे थे। कोई ऑन लाइन वीडियो देख रहा था तो कोई मोबाइल एप अपलोड करने में लगा हुआ था।
खिल गए चेहरे
ये वे यात्री थे जिन्हें यह बताया गया था कि स्टेशन पर फ्री वाईफाई की सुविधा शुरू हो गई है। हालांकि स्टेशन पर आने वाले अधिकतर यात्रियों को जानकारी नहीं थी, लेकिन जैसे ही यात्रियों को इस बारे में बताया गया, तो स्मार्ट फोन चलाने वालों के चेहरे खिल गए।
एेसे लीजिए मुफ्त वाईफाई का मजा
स्टेशन परिसर में पहुंचते ही मोबाइल के वाईफाई को ऑन कीजिए। रेंज में आते ही इसमें रेलवॉयर के नाम से वाईफाई कनेक्ट का सिग्नल शो करेगा। इस पर क्लिक करते ही आपका मोबाइल नंबर मांगेगा। नंबर डालते ही वन टाइम पासवर्ड आपके मोबाइल पर आ जाएगा। पासवर्ड डालते वाईफाई कनेक्ट हो जाएगा।
देख सकेंगे मूवीज
भोपाल स्टेशन पर शुक्रवार से फ्री वाईफाई की सुविधा शुरू हुई है। इस की खासियत है कि स्टेशन पहुंचने वाला कोई भी व्यक्ति इसका लाभ ले सकता है।100 एमबीपीएस तक की हाईस्पीड से नेट चलने पर मोबाइल का मजा कई गुना हो जाता है। फ्री वाईफाई से ऑन लाइन मूवीज, म्यूजिक, वीडियोज के साथ ही एप अपडेट कर सकते हैं। इसके साथ ही रेलवे से जुड़ी तमाम जानकारियां तेजी से प्राप्त की जा सकती है।

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